कभी सोचते थे इश्क अगर गुनाह है,
तो ये गुनाह हम भी करेंगे
तेरी खातिर इस ज़माने से दुश्मनी भी सह लेंगे
पर मरेंगे तेरी ही दर पे सर रखके
कम से कम दो आंसू तेरे भी बहेंगे
तेरी परियो सी हंसी को जेहन में बसाया था
कोई परेशानी न हो तुझे, इन पलकों पे बैठाया था
पर इस वक़्त ने ऐसा मनहूस खेल रचाया
के अब सोचते हैं की
इस हंसी से तो तेरी वो मायूसी ही अच्छी थी
कम से कम मेरी याद तो दिलाती थी
जी करता है
फफक पड़े अश्क-ऐ-अब्र
और बरस पड़े ताबड़तोड़ मेरी शिकायतें तुझसे बेसब्र
उसी बाढ़ में बह जायेंगे तेरी यादों के घरौंदे
और मेरे सपनों के महल
और शायद हमारे बीच कड़ी ये दीवार भी
